RAJESH _ REPORTER

अब कलम से न लिखा जाएगा इस दौर का हाल अब तो हाथों में कोई तेज कटारी रखिये

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वो रंडी है ?

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रंडी शब्द सुनते है तथाकथित सभ्य समाज अपनी भौ तान लेता है घूर घूर कर आप को देखने लग जाता है ऐसे घृणा और हेय की दृष्टि से देखा जाता है जैसे आप ने कुछ ऐसा कह दिया हो जो कल्पना से परे है लेकिन आखिर रंडी शब्द या नाम आया कहा से आसमान से तो आया नहीं ये नाम भी तो हम और आप में से किसी एक ने ही दिया होगा तो आखिर इस नाम से इतनी घृणा क्यों ? जैसे जैसे समय बदला परिस्थितिया बदली हम और आप बदले उसी प्रकार इनका नाम भी बदला लेकिन इनकी हालत में कोई सुधार आज तक ना हुआ कहने को तो हम चाँद तारे और मंगल की शैर कर आये लेकिन हमारे ही समाज में रहने वाली जिन्हे हम पहले रंडी या वैश्या के नाम से जानते थे अब वो सिर्फ कॉल गर्ल ,में परिवर्तित हो गया है चाहे देश के किसी सहर में चले जाये वैश्या घर अर्थात चकला घर आप को मिल जायेगा जहा पुरुष अपनी काम पिपासा को शांत कर चुपके से निकल आता है और फिर सभ्य बना घूमता है लेकिन ये पहले भी असभ्य कहलाती थी आज भी असभ्य और हेय ही कहलाती है। इसी देश के चकला घरो में लाखो लडकिया कुछ स्वेक्षा से तो कुछ जबरन देह व्यपार के धंधे में धकेल दी जाती है जिन्हे ढकेलने वाला कोई दूसरा नहीं हम और आप जैसे पुरुष ही है जो अपने लाभ के लिए किसी के बगियाँ के फूल को असमय ही कुचल डालते है लेकिन वो सभ्य कहलाते है और ये अशभ्य ये हमारी मानसिकता है जिसमे बदलाव लाने का समय आ गया है हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा। चकला घरो को शायद ही समाप्त किया जा सकता है यह पुरुषो की जरुरत बन चुकी है यह अनवरत चलने वाला एक पेशा बन चूका है अब लेकिन इन वैश्याओ के भी दर्द है जो साफ़ तौर पर चेहरे से झलकते है /कुछ आशाये और अभिलाषाएँ इनकी भी है। इन्होने भी कभी सोचा था की इनका भी एक अपना घर होगा इन्हे भी अच्छी नजर से देखा जायेगा क्योकि कोई खुद रंडी बनना नहीं चाहता। हलाकि देश में इनके पुनर्वाश के नाम से अरबो रूपये गैर सरकारी संगठनो को मुहैया करवाये जाते है लेकिन वो राशि इन तक ना पहुंच कर तथाकथित सभ्य लोगो तक ही रह जाती है और इनकी स्थिति जस की तस बनी रहती है ऐसी कई योजनाये जो इनके पुनर्वाश के लिए बनाई गई है वो कागजो तक ही सिमटी हुई है जरुरत है सभ्य समाज आगे बढे और अपने ही बीच रहने वाली इस आधी आबादी को भी बचाये ?

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